Kingdoms after Gupta Dynasty

KINGDOMS AFTER GUPTA DYNASTY

KINGDOMS AFTER GUPTA DYNASTY

गुप्त वंश  के पतन के पश्चात अन्य वंश तथा राज्य (Dynasties and Rulers After Gupta Dynasty)

गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात छोटे -छोटे राज्यों(Smaller States) तथा क्षेत्रीयता की भावना में वृद्धि आयी।  हालाँकि गुप्त वंश के पश्चात कुछ शक्तिशाली राज्यों का उत्थान हुआ।

हर्षवर्धन (606 AD -647 AD )

हर्षवर्धन का जन्म 591 ईसवी के लगभग हुआ।  वह पुष्यभूति परिवार से सम्बंधित था और प्रभाकर वर्धन का छोटा पुत्र था।

अपने बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात  थानेश्वर  (King of Thaneshwar) के राजा के रूप में में हर्षवर्धन ने अपना कार्यकाल शुरू किया।

कामरूप शासक भास्कर वर्मा (Kamrup ruler Bhaskar Verma)से संधि करने के पश्चात गौड़ शासक शशांक(Defeated Shashank) के विरुद्ध युद्ध कर उसे हराया।

चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्धितीय(Pulkeshin-II defeated Harshvardhana)  ने 620 ईसवी में हर्षवर्धन की सेना को नर्मदा के तट पर हरा कर सकलोत्तर-पथा -नथा (Sakalottara-patha-natha)की उपाधि ग्रहण की।

हर्षवर्धन ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी जिसमे हिमालय  पर्वतों तक , दक्षिण में नर्मदा के तट तक , पूर्व में गंजाम तथा पश्चिम में वल्लभी तक फैली थी।  (Brought 5 indies in his control i.e. Punjab, Kannauj, Bengal, Bihar and Orissa)  तथा इस विशाल राज्य की राजधानी कन्नौज थी।

हर्षवर्धन शिव और सूर्य की उपासना(Worshipped Shiv and Sun) करता था। परन्तु बाद में उसका झुकाव बौद्ध धर्म के महायान (Mahayan Sect of Budhism ) की तरफ हो गया।

अपने राज्य  में हर्षवर्धन ने आम लोगों के लिए जगह-जगह  पर धर्मशालाएं , चिकित्सालय और कुओं आदि का निर्माण करवाया।

हर्षवर्धन एक उच्च कोटि का कवि (Poet)भी था तथा उसने संस्कृत में प्रियदर्शिका, नागनन्द और रत्नावली (Priyadarshika, Nagnanda and Ratnavali)नामक नाटकों की रचना भी की।

चीनी यात्री हेनसांग हर्षवर्षण के कार्यकाल में ही भारत आया था तथा वह 630-645 ईसवी तक  भारत में रहा।  वह नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय में पड़ने के लिए तहत बौद्ध ग्रन्थ एकत्रित करने के उद्देशय से भारत आया था।
हर्षवर्धन ने अपने राजदरबार में कादंबरी (Kaadambari)के रचयिता बाणभट्ट(Banbhatta)(तथा सुभाषितवली(Subhashitvalli) के रचयिता मयूर (Mayur)को भी आश्रय प्रदान किया था।

कन्नौज में हर्षवर्धन प्रत्येक 5 वर्ष में एक महासम्मेलन (Used to organize a big ceremony after every 5 years interval)आयोजित करता  था जिसमे वह बहुत दान करता था।

बौद्ध धर्म(महायान) के सिद्धांतों के प्रचार (Propagation of principles of Budhism)के लिए हर्षवर्धन ने कन्नौज में एक महासम्मेलन का आयोजन भी किया था।
647 ईसवी में हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई  तथा निसंतान होने के कारण पुष्यभूति वंश का भी अंत हो गया।

 

मध्य एवं दक्षिण भारतीय राज्य 

वाकाटक वंश 

इस वंश का मूल निवास स्थान विदर्भ(Vidarbha) था।

यह एक ब्राह्मण वंश(These were Brahmins) था।

इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा प्रवरसेन(Pravarsen -I) प्रथम था।
उसे सम्राट की उपाधि धारण की तथा चार अश्वमेघ (4- Ashwamegha Sacrifices)यज्ञ करवाए थे।
चन्द्रगुप्त -II  ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक राजा रुद्रसिंह (Rudrasimha)से किया था।

 

बादामी के चालुक्य 

इस वंश का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था।
इके राज्य की राजधानी वातापी(Vatapi) थी जो कि अभी बादामी, कर्नाटक(Modern Badami, Karnataka) में स्थित है  .
चीनी यात्री हेनसांग(Hiuen Tsang visited during this period in Vatapi) पुलकेशिन द्धितीय के शासनकाल में चालुक्य साम्राज्य की यात्रा पर आया।
चालुक्य ु उस  समय समृद्ध जल सैन्य (They were maritime power of this time) शक्ति थे।
अजंता और एल्लोरा गुफाओं(Most of painting in Ajanta and Ellora Caves were of this time only) की बनायीं गई अत्यधिक चित्रकला इसी समय की है।  उन्होंने ऐहोल में कई भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया (Aihole is called the cradle of Indian temple architecture.)

 

 

नोट-  दो अन्य चालुक्य वंश थे – 1. वेंगी के पूर्वी चालुक्य  (Vengi of Eastern Chalukyas)और कलवानी के  पश्चिमी चालुक्य(Western Chalukyas of Kalvani)।
वेंगी चालुक्य (Vengi Chalukya was founded by the brother of Pulkeshin-II , Kubja-Vishnu-Vardhan)की स्थापना पुलकेशिन-II के भाई  कुब्जा-विष्णु-वर्धन द्वारा की गई।  यह एक कमजोर राज्य था जो की बाद में चोल राज्य का भाग बन गया।

राष्ट्रकूट वंश

इस वंश का संस्थापक दन्तिदुर्ग था।
इससे पहले यह वंश चालुक्यों के सामन्त(District Officer of Chalukyas) थे।
कृष्णा-I ने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर(Kailash Temple of Ellora) का निर्माण भी करवाया था।
राष्ट्रकूट वंश का शासक ध्रुव (780-793 AD)ऐसा पहला शासक था जिसने उतरी भारत पर अधिकार करने हेतु त्रिकोणीय संघर्ष में हस्तक्षेप कर गुर्जर-प्रतिहार नरेश वरसराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को  पराजित किया
ध्रुव के उत्तराधिकारी गोविन्द तृतीय (780 -793 AD) ने मालवा, कौशल,बंगाल, कलिंग पर अधिकार स्थापित किया।
गोविन्द तृतीय का उत्तराधिकारी अमोघवर्ष(814-876 AD)  की रूचि धर्म और साहित्य में थी तथा कई विद्धानों एवं कलाकारों को आश्रय प्रदान किया था। उसने कन्नड़ कविता ‘कविराज मार्ग ‘ तथा ‘प्रश्नोत्तर मल्लिका ‘ भी लिखी।
इन्द्र -III (915-927 AD) इस वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक था।   इसके समय में अरब यात्री अल मसूदी भारत की यात्रा पर आया था।

इस वंश के शासक कृष्ण-III ने चोल राज्य पर विजय प्राप्त करने के पश्चात (Build Vijay Stambh at Rameshwaram after defeating Cholas) रामेश्वरम में एक विजय स्तम्भ तथा एक मंदिर का निर्माण भी करवाया था।
राष्ट्रकूटों ने एलीफैंटा(Build Elephanta Caves) के गुफाओं का निर्माण भी करवाया।  जो की महेश(शिव) को समर्पित थी भारत की सबसे भव्य रचनाओं में से एक है।

 

गंग वंश 

इन्हे उड़ीसा के चेद्गंग भी कहा जाता है।

गंग वंश से पहले उड़ीसा में केसरी वंश(Kesaris of Orissa) का शासन था जिन्होंने भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर (Build Lingraja Temple)का निर्माण भी करवाया।

गंग  वंश के राजा नरसिंहदेव ने कोणार्क में सूर्य मंदिर(Sun Temple at Konark) का निर्माण भी करवाया।

अनंतवर्मन गंग ने पूरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ पूरी(Jagannath Puri Temple at Puri) मंदिर का निर्माण भी करवाया।

पल्लव वंश

इस वंश का संस्थापक सिंहविष्णु था जिसका शासन काल 574-600 AD तक रहा।
इनकी राजधानी कांची थी।

इस वंश के दौरान महाकवि भारवि (Bharvi wrote Kiratarjunium) ने किरातार्जुनियम की रचना की।

नरसिंहवर्मन इस वंश का सबसे महान शासक था।  उसने पुलकेशिन -II को भी पराजित किया तथा इसकी याद में विजय स्तम्भ का निर्माण भी करवाया।  तथा इसके शासनकाल में हेनसांग भी कांची आया था।

कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन -II ने करवाया था।

चोल वंश 

 

संस्थापक -विजयालय  तथा राजधानी तंजौर थी। 

9 वी शताब्दी के अंत तक इन्होने कांची से पल्ल्वों (Weakened pallvas)को तथा पांड्यों को कमजोर कर दक्षिण तमिल प्रदेश को अपने अधिकार में कर लिया।  तक्कोलम के युद्ध में इन्हे राष्ट्रकूट शासक कृष्णा-III से हार का सामना करना पड़ा।  हालांकि बाद में इन्होने राष्ट्रकूटों को भी हराया  था।

राजराजा -I ने चोल वंश के साम्राज्य को दक्षिण भारत तक(Conquered almost Southern India) फैलाया।

चोल वंश का व्यापर चीन (Also traded with China) के साथ भी होता था।  राजराजा ने उतरी श्रीलंका को जीत कर इसे मुम्मदी-चोलामंडलम(Mummadi-Cholamandalam) दिया तथा मालदीव  द्धीप पर भी अधिकार किया।

राजराजा ने तंजौर में राजराजेश्वरी मंदिर(Rajarajeshwari Temple) का निर्माण भी करवाया।

राजेंद्र-I ने पूरी श्रीलंका (Conquered Sri Lanka)पर अधिकार कर लिया।

उसके पुत्र राजाधिराज-I ने अश्वमेघ यज्ञ (Ashwamegha Sacrifice) भी करवाया।

1115 AD तक चोल साम्राज्य अटूट रहा।

इनका साम्राज्य 6 मंडलों (6-Mandals)में विभाजित था।

शिव की नाचती हुई मूर्ति “नटराज” (Natraj)इसी समय की है।

इनके शासनकाल में स्थानीय सरकार (Local Self Government)भी हुआ करती थी वर्तमान में पंचायती राज (Panchayati Raj System)का सिद्धांत यहीं से लिया गया है।

 


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